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Showing posts from September, 2010

मैँने आँसू बनकर देखा है॥

पढ़ लिए सारे शास्त्र, रट लिए वेद पुराण, पर समझ न पाया इसकी भाषा, इसकी पीड़ा, करुणा और अभिलाषा, एक अश्रु जो कभी, गम को दर्शाता है, तो कभी खुशियोँ को भी, अंखियोँ मेँ दिखाता हैँ, कौन जाने क्या होगी इसकी कहानी, दिल मेँ आग दृगोँ मेँ पानी, मिलेँगे हर मोँड़ पर आँसू, जीवन भी टेढ़ी रेखा हैँ, जानता हूँ मैँ इसको क्योँकि, मैँने आँसू बनकर देखा हैँ॥

प्रेम दीवाना

आज फिर मेरी फुलवारी, मेँ खिला है एक गुलाब, उसकी सुर्ख लाल पंखुड़ियाँ, चारोँ तरफ फैलती , भीनी भीनी खुशबू, प्रभात को भी अर्ज करती थी आदाब॥ ******************* पंखुड़ियोँ पर जमी ओस पर, जब पड़ती थी सूर्य की मंद किरण, सतरंगी प्रकाश की किरणेँ, रंग देती थी वातावरण॥ ******************* मैँ भी उस फूल को निहार रहा था, पर मेरा ध्यान उन काँटोँ पर गया, जो उस फूल की सुरक्षा मेँ लगे थे, जिन्होने खुद की सुन्दरता त्यागी, उस दो दिन के मेहमान के लिए॥ ******************* मैँ उसकी पंखुड़ियोँ की स्निग्धता, पर मैँ इतना मुग्ध था कि मैँने उसे तोड़ लिया, उसे उन काँटोँ से अलग कर दिया॥ ******************* मैँने उसे जल मेँ रखा, परिस्थितियाँ अब भी उसके अनुकूल थी, पर उस फूल को शूल से पृथक करना, क्या मेरी भूल ना थी? ******************* *******************

नीम का पेड़

बचपन मेँ, साँझ ढले, उस गली मेँ उगे, नीम के नीचे, बैठा करते थे कुछ वृद्ध जन। खो जाते थे अतीत मे, वर्तमान को झकझोरते हुए, भविष्य को देते थे सम्मन, आज जब बीस बरस बाद, जब मैँ लौटा हूँ, फिर उस गली मेँ, सब कुछ बदल गया है, शाम तो वही है , पर न तो वृद्ध जन, न ही वह रौनक, सब अपनोँ मेँ व्यस्त । और अपनत्व से भरा, वह नीम का पेड़, मुरझाया हुआ , तड़पता हुआ, अपने अन्त पर रो रहा था, सुनहरे अतीत को याद कर, किसी सरकटी लाश की तरह, असाध्य वेदना से ग्रसित होकर . . . . . . . . .

Welcoming the 9th month of the year