आज फिर मेरी फुलवारी,
मेँ खिला है एक गुलाब,
उसकी सुर्ख लाल पंखुड़ियाँ,
चारोँ तरफ फैलती ,
भीनी भीनी खुशबू,
प्रभात को भी अर्ज करती थी आदाब॥
*******************
पंखुड़ियोँ पर जमी ओस पर,
जब पड़ती थी सूर्य की मंद किरण,
सतरंगी प्रकाश की किरणेँ,
रंग देती थी वातावरण॥
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मैँ भी उस फूल को निहार रहा था,
पर मेरा ध्यान उन काँटोँ पर गया,
जो उस फूल की सुरक्षा मेँ लगे थे,
जिन्होने खुद की सुन्दरता त्यागी,
उस दो दिन के मेहमान के लिए॥
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मैँ उसकी पंखुड़ियोँ की स्निग्धता,
पर मैँ इतना मुग्ध था कि
मैँने उसे तोड़ लिया,
उसे उन काँटोँ से अलग कर दिया॥
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मैँने उसे जल मेँ रखा,
परिस्थितियाँ अब भी उसके अनुकूल थी,
पर उस फूल को शूल से पृथक करना,
क्या मेरी भूल ना थी?
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मेँ खिला है एक गुलाब,
उसकी सुर्ख लाल पंखुड़ियाँ,
चारोँ तरफ फैलती ,
भीनी भीनी खुशबू,
प्रभात को भी अर्ज करती थी आदाब॥
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पंखुड़ियोँ पर जमी ओस पर,
जब पड़ती थी सूर्य की मंद किरण,
सतरंगी प्रकाश की किरणेँ,
रंग देती थी वातावरण॥
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मैँ भी उस फूल को निहार रहा था,
पर मेरा ध्यान उन काँटोँ पर गया,
जो उस फूल की सुरक्षा मेँ लगे थे,
जिन्होने खुद की सुन्दरता त्यागी,
उस दो दिन के मेहमान के लिए॥
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मैँ उसकी पंखुड़ियोँ की स्निग्धता,
पर मैँ इतना मुग्ध था कि
मैँने उसे तोड़ लिया,
उसे उन काँटोँ से अलग कर दिया॥
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मैँने उसे जल मेँ रखा,
परिस्थितियाँ अब भी उसके अनुकूल थी,
पर उस फूल को शूल से पृथक करना,
क्या मेरी भूल ना थी?
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