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चक्र चलता रहा

चक्र चलता रहेगा,
अपनी मन्थर गति से,
युग बदलता रहेगा,
किसी भी कीमत पर निरन्तर!

जो है आज प्रस्तर खंड,
कल हो सकते है,
ऊँचे एवं विशाल पर्वत,
या मिट सकते है उनके
भी नामोँ - निशाँ,
सब कुछ बदलता रहा,
चक्र चलता रहा!

इस समय चक्र ने,
मिटा दिए अनेकोँ गमोँ को,
भुला दिए उन जख्मोँ को,
जो मिले थे कभी,
सुखा दिए उन घावोँ को,
जो हुए थे कभी,
सब कुछ बदलता रहा!
चक्र चलता रहा!

समय बदलता रहा,
भूत से वर्तमान,
वर्तमान से भविष्य,
जहाँ कल थे वन और पहाड़,
आज वहाँ है मनुष्योँ की बस्ती,
तो कल वहाँ होँगे,
जंगल स्टील व कँक्रीटोँ के,
पर मनुष्य शायद वहीँ हैँ,
वही जंगलीपन वही दुर्दान्दता,
शायद चक्र के बदलने का
उस पर असर ना था!
बिना किसी अवरोध के,
समय बदलता रहा,
पर मनुष्य चलता रहा!

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