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बचपन में खास थे ... जवानी में, आम बन गये..

चार पन्ने कॉपी से निकाल कर...
जहाज बनाया करते थे...
बरसात की नालियों में... बेबाक तैरती थीं..
हवाओं में उड़ाते थे, हमारे खुद के हवाई जहाज..
मिट्टी की गाड़ियों के कितने ही काफिले थे..
अपनी शिक्षिका से डरते थे.. चुपके चुपके उन्ही पे
मरते थे..
इश्क़ जैसी बला से कोसों दूर... माँ की गोद में
महफूज़...
सरहद.. नफ़रत.. मज़हब.. सियासत..
शब्दकोष में भी न थे हमारे...
छत की मुंडेर पे खड़े... अपनी सल्तनत के सुल्तान
हम...
आज चंद सिक्कों के ग़ुलाम बन गये...
बचपन में खास थे ... जवानी में, आम बन गये..

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A Soldier's Poetry

भर जाएँगे घाव, बिसर जाएगी टीस, है ना, हमारे पास समय का मलहम, और काम आएगा संयम, काम आएगा सामर्थ्य, काम आऍगे ईश्वर, भर जाएँगे घाव॥

Welcoming the 9th month of the year

बस थोड़ा इन्तजार और कर लो।

न होगी गमोँ की रात, न होगी कष्टोँ की बरसात, बदलेगा अपना भी जीवन, खुशियोँ से भर जायेँगे दामन, बस थोड़ा इन्तजार और कर लो। दिन बदलेँगे अपने भी, होगा इक नया सवेरा, चिड़ियोँ की चहकन से गूँजेगा अपना बसेरा, बस थोड़ा इन्तजार और कर लो। तब न आएगी कोई मुश्किल, न बिगड़ेगी कोई बात, लम्बे होँगे खुशियोँ के दिन, कम होगी कष्टोँ भरी रात, बस थोड़ा इन्तजार और कर लो। तुम चलना मेरे संग-संग, बदलेँगे अपने रंग-ढंग, हो जाएँगे गैर भी अपने, पूरे होँगे अपने सपने, बस थोड़ा इन्तजार और कर लो।