बचपन मेँ, साँझ ढले, उस गली मेँ उगे, नीम के नीचे, बैठा करते थे कुछ वृद्ध जन। खो जाते थे अतीत मे, वर्तमान को झकझोरते हुए, भविष्य को देते थे सम्मन, आज जब बीस बरस बाद, जब मैँ लौटा हूँ, फिर उस गली मेँ, सब कुछ बदल गया है, शाम तो वही है , पर न तो वृद्ध जन, न ही वह रौनक, सब अपनोँ मेँ व्यस्त । और अपनत्व से भरा, वह नीम का पेड़, मुरझाया हुआ , तड़पता हुआ, अपने अन्त पर रो रहा था, सुनहरे अतीत को याद कर, किसी सरकटी लाश की तरह, असाध्य वेदना से ग्रसित होकर . . . . . . . . .